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फिराना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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फिराना क्रि॰ स॰ [हिं॰ फिरना]

१. इधर उधर चलाना । कभी इस ओर कभी उस ओर ले जाना । इधर उधर डुलाना । ऐसा चलाना कि कोई एक निश्चित्त दिशा न रहे ।

२. टह- लाना । सैर कराना । जैसे,—जाओ, इसे बाहर फिरा लाओ ।

३. चक्कर देना । बार बार फेरे खिलाना । लट्टू की तरह एक ही स्थान पर घुमाना अथवा मंडल या परिधि के किनारे घूमाना । नचाना या परिक्रमण कराना । जैसे, लट्टू फिराना, मंदिर के चारों ओर फिराना । उ॰—(क) फिरै लाग बोहित तहँ आई । जस कुम्हार धरि चाक फिराई ।— जायसी (शब्द॰) । (ख) हस्ति पाँच जो आगे आए । ते अंगद धरि सूँड़ फिराए ।—जायसी (शब्द॰) । संयो॰ क्रि॰—डालना ।—देना ।—लेना ।

४. ऐंठना । मरोड़ना । जैसे,—ताली उधर को फिराओ । उ॰— मद गजराज द्वार पर ठाढ़ो हरि कह्यो नेकु बचाय । उन नहिं मान्यो संमुख आयो पकरयो पूँछ फिराय ।—सूर (शब्द॰) ।

५. लौटाना । पलटाना । उ॰—तुम नारायण भक्त कहावत । काहे को तुम मोहिं फिरावत ।—सूर (शब्द॰) ।

६. एक ही स्थान पर रखकर स्थिति बदलना । सामना एक ओर से दूसरी ओर करना । दे॰ 'फेरना' । उ॰—मुख फिराय मन अपने रीसा । चलत न तिरिया कर मुख दीसा ।—जायसी (शब्द॰) । संयो॰ क्रि॰—देना ।—लेना ।

७. किसी ओर जाते हुए को दूसरी ओर चला देना । घुमाना । दे॰ 'फेरना' ।

८. और का और करना । परिवर्तन करना । बदल देना । दे॰ 'फेरना' ।

९. बात पर दृढ़ न रहने देना । विचलित करना । दे॰ 'फेरना' ।