फूँक
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]फूँक संज्ञा स्त्री॰ [अनु॰ फू फू]
१. मुँह को बटोरकर वेग के साथ छोड़ी हुई हवा । वह हवा जो ओंठों को चारों ओर से दबाकर झोंक से निकाली जाय । जैसे,—वह इतना दुबला पतला है कि फूँक ले उड़ सकता है । मुहा॰—फूँक मारना = जोर से मुहँ की हवा छोड़ना । जैसे, आग दहकाने या दिया बुझाने के लिये ।
२. साँस । मुँह की हवा । उ॰—कुँवर और उमराव बने बिगरे कछु नाहीं । फूँक माहिं वे बनत फूँक ही सों मिटि जाहीं ।— श्रीधर (शब्द॰) । मुहा॰—फूँक निकल जाना = दम निकल जाना । प्राण निकल जाना ।
३. मंत्र पढ़कर मुँह सें छोड़ी हुई वायु जो उस मनुष्य की ओर छोड़ी जाती है जिसपर मंत्र का प्रभाव डालना । होता है । उ॰—परम परब पाय, हाय जमुना के नीर पूरि कै पराग अंगराग के अगर तें । द्बिजदेव की सों द्बिजराज अंजली के काज जौ लौं चहे पानिप उठाय कंज कर तें । तौ लौं वन जाय मनमोहन मिलापी कहूँ फूँक सी चलाई फूँकि बाँसुरी अधर तें । स्वासा काढ़ों नासा तें, वासा तें भुजाएँ काढी़ अंजली न अंजली तें, आखरी न गर तें ।—द्बिजदेव (शब्द॰) । यौ॰—झाड़फूँक = मंत्र यंत्र का उपचार । क्रि॰ प्र॰—चलाना ।—मारना ।
४. गाँजा, तंबाकू आदि का कश ।