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फेँट

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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फेँट ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ पेट या पेटी, अथवा देश॰]

१. कमर का घेरा । कटि का मड़ल । उ॰— फेंट पीतपट साँवरे कर पलास के पात । हँसत परस्पर ग्वाल सब बिमल बिमल दधि खात ।— सूर (शब्द॰) ।

२. धोती का वह भाग जो कमर में लपेटकर वाँधा गया हो । कमर में बाँधा हुआ कोई कपड़ा । पटुका । कमरबंद । उ॰—(क) खायबे को कछु भाभी दोनी श्रीपति मुख तें बोले । फेंट उपर ते अंजुलि तंदुल बल करि हरि जु खोले ।— सूर (शब्द॰) । (ख) लाल की फेंट सों लैकै गुलाल लपेटि गई अब लाल के गाल सों ।— रघुनाथ (शब्द॰) । मुहा॰—फेंठ गहना, धरना या पकड़ना = जाने न देना । रोकना । इस प्रकार पकड़ना कि भागने न पाए । उ॰— (क) श्याम सखा को गेंद चलाई । धाय गह्यो तब फेंट श्याम की देहु न मेरी गेंद मँगई ।—सूर (शब्द॰) । (ख) अब लौ तो तुम विरद बुलायो भई न मोसों भेंट । तजौ बिरद कै मोहि उबारौ सूर गही कसि फेंट । —सूर (शब्द॰) । (ख) जो तू राम नाम चित धरती । सूरदास बैकुंठ पैठ में कोउ न फेंट पकरतो ।— सूर (शब्द॰) । फेंट कसना या बाँधना = कटिबद्ध होना । कमर कसकर तैयार होना । सन्नद्ध होना । उ॰—(क) ढोल बजावती गावती गोत मचावती घुँघुर धूरि के धारन । फेंट फते की कसे द्विजदेव जू चंचलता बस अंचल तारन । —द्विजदेव (शब्द॰) । (ख) पाग पेंच खैच दै, लपेटि पट फेट बाँधि, ऐंड़े ऐंड़े आवैं पैने टूटे ड़ीम ड़ीम ते । —हनुमान (शब्द॰) । ३ । फेरा । लपेट । घुमाव ।

फेँट ^२ संज्ञा स्त्री॰ [फेँटना] फेंटने की क्रिया या भाव ।