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फोँक

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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फोँक ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ पुङ्ख] तीर के पीछे की नोक जिसके पास पर लगाए जाते हैं और जिसे रोंदे पर चढ़ाकर चलाते हैं । इस नोक पर गड्ढा या खड्डी बनी रहती है जिसमें धनुष की डोरी बैठ जाती है । उ॰—(क) परिमल लुब्ध मधुप जह बैठत उड़ि न सकत तेहि ठाँते । मनहुँ मदन के हैं शर पाए फोंक बाहरी घातें ।—सुर (शब्द॰) । (ख) शोभन सिँगार रस की सी छींट सोहे फाँक कामशर की सी कहों युगतिनि जोरि जोरि ।—केशव (शब्द॰) । (ग) समर में अरि-गज-कुंभन में हनो तीर फोंक लौ समात वीर ऐसो तेजधारी है ।—गुभान (शब्द॰) । (घ्) बान करोर एक मुँह छुटहिं । बाजहिं जहाँ फोंक लहि फुटहिं ।— जायसी (शब्द॰) ।

फोँक ^२ वि॰ [देश॰] दलालों की बोली में 'चार' ।

फोँक ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ स्फोट या सं॰ वल्कल, हिं॰ बोकला, फोकला]

१. सार निकल जाने पर बचा हुआ अंश । वह वस्तु जिसका रस या सत निकाल लिया गया हो । सीठी ।

२. भुसी । तुष । वह वस्तु जिसमें छिलका ही छिलका रह गया हो, असल चीज निकल गई हो ।

३. बिना स्वाद की वस्तु । फीकी या नीरस चीज ।