बरही
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]बरही ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ वहि]
१. मयूर । मोर । उ॰—लता लचत बरही नचत रचत सरस रसरंग । घन बरसत दरसत दृगन सरसत हियै अनंग ।—स॰ ससक, पृ॰ ३९० ।
२. साही नाम का जंगली जंतु । उ॰—पुनि शत सर छाती महँ दीन्हें । बीसहु भुज बरही सम कीन्हें ।—विश्राम (शब्द॰) ।
३. अग्नि । आग । (डिं॰) ।
४. मुरगा ।
५. द्रुम । वृक्ष ।— अनेकार्थ॰, पृ॰ १४३ ।
६. अग्नि ।—अनेकाथ॰, पृ॰ १४३ ।
बरही ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ बारह + ई (प्रत्य॰)]
१. प्रसूता का वह स्नान तथा अन्यान्य क्रियाएँ जो संतान उत्पन्न होने के बारहवें दिन होती हैं ।
२. संतान उत्पन्न होने के दिन से बारहवाँ दिन ।
बरही ^३ संज्ञा स्त्री॰ [देश॰]
१. पत्थर आदि भारी बोझ उठाने का मोटा रस्सा ।
२. जलाने की लकड़ी का भारी बोझा । ईधन का बोझा । उ॰—(क) शक्ति भक्त सों बोलि दिनहि प्रति बरही डारैं ।—नाभा जी (शब्द॰) । (ख) नित उठ नौव ा नाव चढ़त है बरही बेरा बारि उही ।—कबीर (शब्द॰) ।