बहर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बहर पु ^१ क्रि॰ वि॰ [हिं॰ बाहर] दे॰ 'बाहर' । उ॰—दरिया गुर दरियाव की, साध चहूँ दिस नहर । संग रहै सोई पिए, नहिं फिरै तृषाया बहर ।—दरिया॰ बानी, पृ॰ ३१ ।

बहर ^२ संज्ञा स्त्री॰ [अ॰ बह्र] छंद । वृत्त । उ॰—काम कामिनी तै ललित केलि कला कमनीय । रंग भरी राजत रवन बहर बनी रवनीय ।—स॰ सप्तक, पृ॰ ३५२ । विशेष—छंद को उर्दू में बहर कहते हैं । मशहूर बहरें कुल उन्नीस हैं । उनमें से कुल पांच बहरें खास अरबी के लिये हैं । बाकी अरबी ओर फारसी दोनों में काम देती हैं ।

बहर ^३ संज्ञा पुं॰ [अ॰ बह] समुद्र । सागर । उ॰—बहर रूप सम भृप रूप अनभूत सँचारिय ।—पृ॰ रा॰, ७ । ९३ ।

बहर पु ^४ संज्ञा पुं॰ [अ॰ वहल] पंक । कर्दम । कीचड़ । उ॰—एक लरत गिरत घुंमत घटत भटक, नट्ट मंडिय बहर ।—पृ॰ रा॰, १३ । ७० ।