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बहिर्रति

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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बहिर्रति संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ बहिर् + हिं॰ रति] केशव के अनुसार रति के दो भेदों में एक । बाहरी रति या समागम जिसके अंतर्गत आलिंगन, चुंबन, स्पर्श, मर्दन, नखदान, रददान और अधरपान हैं । उ॰—बहिर्रति सात अरु अतर्रति सात सुन रति बिपरीतनि को विविध विचार है ।—केशव (शब्द॰) ।