बाधना
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]बाधना पु ^१ क्रि॰ सं॰ [स॰ बाधन] बाधा ड़ालना । रुकावट डालना । रोकना । उ॰—(क) सुमिरत हरिहि सापगति बाधी । सहज विमल गन लागि समाधी ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) देखते ही आधे पल बाधी जात बाधा सब राधाजू की रसना सुरूप की सी रानी है ।—केशव (शब्द॰) ।
२. विघ्न करना । बाधा ड़ालना । उ॰— (क) काम सुभासुभ तुमहिँ न बाधा । अब लगि तुमहि न काहू साधा ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) दुख सुख ये बाधैं जेहि नाहीं तेहि तुम जानौ ज्ञानी । नानक मुकुत ताहि तुम मानौ यहि विधि को जो प्राणी ।——नानक (शब्द॰) ।
बाधना पु ^२ कि॰ अ॰ [ सं॰ वर्द्धन, प्रा॰ वद्धण] अभिवृद्ध होना । बढ़ना । उ॰— (क) बलि नंद अति आनद बाघ्यौ चढ़ि हिंडोरे गवई ।— नंद॰, ग्र॰ पृ॰ ३७५ । (ख) मित मित बाधे रिध मिले जय मित दास सुजाण ।—रघु॰ रू॰, पृ॰ ९ ।