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बानि

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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बानि ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ बनना या बनाना]

१. बनावट । सजधज उ॰— वा पटपीत की फहरानि । कर धर चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरति वह बानि ।—सूर (शब्द॰) ।

२. टेव । आदत । स्वभाव । अभ्यास । उ॰—(क) बन ते भागि बिहड़े पर खरहा अपनी बानि । बेदन खरहा कासों कहैं को खरहा को जानि ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) पहले ही इन हन ी पूतना बाँधे वलि सो दानि । सूपनखा ताड़ु का सँहारी श्याम सहज यह बानि— सूर (शब्द॰) । (ग) थोरेई गुन रीझते बिसराई वह बानि । तुमहूँ कान्ह मनो भए आजु कालि के दानि ।— बिहारी (शब्द॰) ।

बानि ^२ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ वर्ण] रंग । चमक । आभा । कांति । उ॰—(क) सुवा ! बानि तारी जस सोना । सिंहलदीप तोर कस लोना ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) हीरा भुजातावीज में सोहत है यहि बानि । चद लखन मुखमीत जनु लग्यो भुजा सन आनि ।—रसनिधि (शब्द॰) ।

बानि पु संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ वाणी] बाणी । बचन । उ॰— करति कछु न कानि बकति है कटु बानि निपट निसज बैन बिलखहूँ ।— सूर (शब्द॰) ।