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बिङ्ग

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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बिंग ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ व्यङ्ग्य]

१. वह चुभती हुई बात जिसका गूढ़ अर्थ हो । व्यंग्य । काकूक्ति । विशेष—दे॰ 'व्यग्य' । उ॰—(क) करत बिंग ते बिंग दूसरी जुक्त अलंकृत माँहीं । सूरदास ग्वालिन की बातें को कस समुझत हाँही ।—सूर (शब्द॰) । (ख) प्रेम प्रशंसा विनय बिंग जुत सुनि विधि की वर बानी । तुलसी मुदित महेस मनहिं मन जगत मातु मुसुकानी ।—तुलसी (शब्द॰)

२. आक्षेपपूर्ण वाक्य । ताना । क्रि॰ प्र॰—छोड़ना ।—बोलना ।

बिंग † ^२ वि॰ [सं॰ वक्र या व्यग्य] [स्त्री॰ बिंगी] वक्र । टेढ़ा । उ॰—मैं कुँआरी छोरियो की एक लंबी साँस हूँ । दो दिलों में चुबनेवाली एक बिंगी फाँस हूँ ।—दाक्खिनी॰, पृ॰ २९५ ।