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बिरकत

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शब्दसागर

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बिरकत पु वि॰ [सं॰ विरक्त] दे॰ 'विरक्त' । उ॰—(क) कामणि अंग बिरकत भया रत भया हरि नांइ ।—कबीर ग्रं॰, पृ॰ ५१ । (ख) बैरागी बिरकत भला ग्रेही चित्त उदार । दोउ बातों खाली पड़ै, ताको बार न पार ।—संतबानी॰, भा॰ २, पृ॰ ४७ । (ग) जल ज्यों निर्मल होय सदा बिरकत वही । तजै न शीतल अंग बसे नित ही मही ।—मन विरक्त॰, पृ॰ २४९ ।