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बिलछाना

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शब्दसागर

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बिलछाना ^१ क्रि॰ अ॰ [सं॰ वि + लक्ष्य (= दृष्टि)] दृष्टि से परे होना । दूर होना । समाप्त होना । उ॰—कहै कबीर सुनो भाई । साधो, लोक लाज बिलछानी ।—संतबानी॰, भा॰ २, पृ॰ १२ ।

बिलछाना ^२ क्रि॰ स॰ [सं॰ वि + लक्ष(= देखना)] पृथक् पृथक् करना । चुनना । बीछना । उ॰—प्रथम कहों अंडज की बानी । एकहि एक कहौं बिलछानी ।—कबीर सा॰, पृ॰ ३९ ।