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बीभत्स

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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बीभत्स ^१ वि॰ [सं॰]

१. जिसे देखकर घृणा हो । घृणित ।

२. क्रूर ।

३. पापी ।

बीभत्स ^२ सज्ञा पुं॰

१. काव्य के नौ रसों के अंतर्गत सातवाँ रस । विशोष— इसमें रक्त, मांस आदि ऐसी बातों का वर्णन होता है जिनसे अरुचि ओर घृणा तथा इद्रियों में संकोच उत्पन्न होता है । इसका वर्ण नील और देवता महाकाल माने गए है । जुगुप्सा इसका स्थायी भाव है, पीब, मेद, मज्जा, रक्त, मांस या उनकी दुर्गंधि आदि विभाग हैं, कप, रोमांच, आलस्य, संकोच आदि अनुभाव हैं और मोह, मरण, आवेग, व्याधि आदि व्यभिचारी भाव हैं । उ॰—यथा पढ़त मत्र अरु यंत्र अत्र लीलत इमि जुग्गिनि । मनहुँ गिलत मद मत्त गरुड़ तिय अरुण उरुग्गिनि । हरबरात हरषात प्रथम परसत पल पंगत । जँह प्रताप जिति जंग रंग अंग अंग उमंगत । जहँ पद्माकर उपपत्ति अति रन रकतन नद्दिय बहत । चख चकित चित्त चरबीन चुभि चकचकाइ चंडी रहत ।—पद्माकर ।

२. अर्जुन का नाम (को॰) ।

३. घृणोत्पादक वस्तु (को॰) ।