बेल

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बेल ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ बिल्व] मझोले आकार का एक प्रसिद्ध कैटीला वृक्ष जो प्रायः सारे भारत में पाया जाता है । श्रीफल । बिल्व । विशेष—इसकी लकड़ी भारी और मजबूत होती है । और प्रायः खेती के औजार बनाने और इमारत के काम में आती है । इससे ऊख पेरने के कोल्हू और मूसल आदि भी अच्छे बनते हैं । इसकी ताजी गीली लकड़ी चंदन की तरह पवित्र मानी जाती है और उसे चीरने से एक प्रकार की सुगंध निकलती है । इसमें सफेद रंग के सुगंधित फूल भी होते हैं । इसकी पत्तियाँ एक सींके में तीन तीन (एक सामने और दो दोनों ओर) होती हैं जिन्हें हिंदु लोग महादेव जी पर चढ़ाते हैं । इसमें कैथ से मिलता जुलता एक प्रकार का गोल फल भी लगता है जिसके ऊपर का छिलका बहुत कड़ा होता है और जिसके अंदर गूदा और बीज हेते हैं । पक्के फल का गूदा बहुत मीठा होता है और साधारणतः खाने या शरबत आदि बनाने के काम में आता है । फल औषध के काम में भी आता है और उसके कच्चे गूदे का मुरब्बा भी बनता है । वैद्यक में इसे मधुर, कसैला, गरम, हृदय को हितकारी, रुचिकारक, दीपन, ग्राही, रूखा, पित्तकारक, पाचक, और वाताति- सार तथा ज्वरनाशक माना है । पर्या॰—विल्व । महाकपित्थ । गोहरीतकी । पूतिवात । मंगल्य । त्रिशिख । मालूर । महाफल । शल्य । शैलपत्र । पत्रश्रेष्ठ । त्रिपत्र । गंधपत्र । लक्ष्मीफल । गंधफल । शिवद्रुम । सदा- फल । सत्यफल ।

बेल † ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ मल्ल या मल्ली] वह स्थान जहाँ शक्कर आदि तैयार होती है ।

बेल ^३ संज्ञा पुं॰ [अ॰] कपड़े या कागज आदि की वह बड़ी गठरी जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिये बनाई जाती है । गाँठ ।

बेल ^४ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ वल्ली]

१. वनस्पतिशास्त्र के अनुसार वे छोटे कोमल पौधे जिनमें कांड या मोटे तने नहीं होते और जो अपने बल पर ऊपर की ओर उठाकर नहीं बढ़ सकते । वल्ली । लता । लतर । विशेष—साधारणतः बेल दो प्रकार की होती है । एक वह जो अपने उत्पन्न होने के स्थान से आस पास के पृथ्वीतल अथवा और किसी तल पर दूर तक फैलती हुई चली जाती है । जैसे, कुम्हड़े की बेल । दूसरी वह जो आस पास के वृक्षों अथवा इसी काम के लिये लगाए गए बाँसों आदि के सहारे उनके चारों ओर घूमती हुई ऊपर की ओर जाती है । जैसे, सुरपेचा, मालती, आदि । साधारणतः बेलों के तने बहुत ही कोमल और बतले होते हैं और ऊपर की ओर अपने आप खड़े नहीं रह सकते । मुहा॰—बेल मँढ़े चढ़ना=किसी कार्य का अंत तक ठीक ठीक पूरा उतरना । आरंभ किए हुए कार्य में पूरी सफलता होना ।

२. संतान । वंश । मुहा॰—बेल बढ़ना=वंशवृद्ध होना । पुत्र पौत्र आदि होना ।

३. विवाह आदि में कुछ विशिष्ट अवसरों पर संबंधियों और विरादरीवालों की ओर से हज्जामों, गानेवालियों और इसी प्रकार के और नेगियों को मिलनेवाला थोड़ा थोडा धन । क्रि॰ प्र॰—देना ।—पढ़ना ।

४. कपड़े या दीवार आदि पर एक पंक्ति में बनी हुई फूल पत्तियाँ आदि जो देखने में बेल के समान जान पड़ती हो ।

५. रेशमी या मखमली फीते आदि पर जरदोजी आदि से बनी हुई इसी प्रकार की फूल पत्तियाँ जो प्रायः पहनने के कपड़ों पर टाँकी जाती हैं । यौ॰—बेलबूटा । क्रि॰ प्र॰—टाँकना ।—लगाना ।

६. नाव खेने का डाँड़ । बल्ली ।

७. घोड़ों का एक रोग जिसमें उनका पैर नीचे से ऊपर तक सूज जाता है । बदनाम । गुमनाम ।

बेल ^५ संज्ञा पुं॰ [फा॰ बेलचह्]

१. एक प्रकार की कुदाली जिसपर मजदूरे जमीन खोदते हैं । यौ॰—बेलदार ।

२. सड़क आदि बनाने के लिये चूने आदि से जमीन पर डाली हुई लकीर जो केवल चिह्न के रूप में अथवा सीमा निर्धारित करने के लिये होती है । क्रि॰ प्र॰—डालना ।

३. एक प्रकार का लंबा खुरपा ।

बेल पु † ^६ संज्ञा पुं॰ [सं॰ मल्लिक]

१. दे॰ 'बेला' ।

२. बेले क ा फूल । उ॰—सिय तुव अंग रंग मिलि अधिक उदोत । हार बेलि पहिरावों चंपक होत ।—तुलसी ग्रं॰ पृ॰ १९ ।

बेल पु ^७ † वि॰ [सं॰ द्वि > प्रा॰ बि, बे + एल (प्रत्य॰)] दो । युग्म । उ॰—जद जागूँ तद एकली जब सोऊँ तब बेल ।—ढोला॰, दू॰ ५११ ।

बेल † ^८ वि॰ [सं॰ √भेलय, या हिं॰ मेल] मददगार । सहायक । साथी । दे॰ 'बेली' । उ॰—सँग जैतावत साहिबौ, दूजो जैत दुझल्ल । जैन कमंधा बेल जे, भाँजण देत मुगल्ल ।—रा॰ रू॰, पृ॰ १२४ ।