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ब्रह्मवैवर्त्त

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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ब्रह्मवैवर्त्त संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह प्रतीति मात्र जो ब्रह्म के कारण हो; जैसे, जगत् की ।

२. ब्रह्म का विवर्त जगत् ।

३. श्रीकृष्ण ।

४. अठारह पुराणों में से एक पुराण जो कृष्ण- भक्ति संबंधी है । विशेष—मत्स्यपुराण में इस पुराण का जो परिचय दिया हुआ हैं, उसमें लिखा है कि इसमें सावर्णि ने नारद से 'रथंतर' कल्प के श्रीकृष्ण का माहात्म्य और ब्रह्मवाराह की गथा कही है । पर इस नाम का जो पुराण आजकल मिलता है, उसमें न तो सावर्णि वक्ता है और न ब्रह्मवाराह की गाथा है । प्रचलित पुराण में नारायण ऋषि नारद जी से और नारद जी व्यास जी से कहते हैं । इसके 'ब्रह्म', 'प्रकृति', 'गणेश' और 'कृष्णजन्म' नामक चार खड हैं । ब्रह्मखंड में परब्रह्मनिरूपण, सृष्टि ब्रह्मंड की उत्पत्ति, कृष्णरूप में नारायण का आविर्भाव, महाविराट्जन्म, रासमंडल, राधा की उत्पत्ति, गोपों और गौओ की उत्पत्ति, पृथ्वी के गर्भ से मंगल की उत्पत्ति, इत्यादि विषय है । प्रकृति खड में शक्ति शब्द की निरुक्ति, ब्रह्मंड की उत्पत्ति, देवताओं का आविर्भाव, सरस्वती, लक्ष्मी और गंगा का परस्पर विवाद और शाप के कारण नदी रुप में हो जाना, भूमिदान आदि का पूण्यस भगीरथ का गंगा लाना, गोलोक में क्रोध करके राधा का गंगा को पान करने दौड़ना, गंगा का श्रीकृष्ण के चरण में शरण लेना, फिर ब्रह्मा आदि की प्रार्थना पर कृष्ण का गंगा ' को पेर से निकाल कर जेना, तुलसी की कथा इत्यादि हैं । गणेशखंड में शिव का पार्वती को गंगातट पर हरिमंत्र देना, पार्वती का कृष्ण से वर प्राप्त करना, गणेशजन्म, गणेश के शिरच्छेद और गजाननत्व का वर्णन है । श्रीकृष्णजन्म खंड में श्रीकृष्ण की अनेक कथाओं ओर विहार आदि का वर्णन है । जेसा ऊपर कहा जा चुका है, इस पुराण के असल होने में बहुत संदेह है । नारद ओर शिवपुराण में दिए हुए लक्षण इसपर नहीं घटते । वैष्णव पुराण तो यह है ही, पर विष्णु के कृष्ण रूप को सबसे अधिक महत्व प्रदान करना ही इसका मुख्य उद्देश्य जान पडता है ।