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भजना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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भजना ^१ क्रि॰ स॰ [सं॰ भजन]

१. सेवा करना ।

२. पु आश्रय लेना । आश्रित होना । उ॰—(क) विधिवश हठि अविवेकहिं भजई ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) तजो हठ आनि भजौ किन मोहिं ।—केशव (शब्द॰) ।

३. देवता आदि का नाम रटना । स्मरण करना । जपना ।

४. अधिकार करना । जीतना । उ॰—कहै बत्त मोर सुनोराति नामं । भज्यौ इक्क अब्बू लग्यो सीस तामं ।—पृ॰ रा॰, १२ ।१२७ ।

भजना पु ^२ क्रि॰ अ॰ [सं॰ वजन, पा॰ बजन]

१. भागना । भाग जाना । उ॰—भजन कह्यौं तातें भज्यौ न एको बार । दूरि भजन जातें कहौ सो तैं भज्यो गँवार ।—बिहारी (शब्द॰) । (ख) दीजै दरस दयाल दया करि, गुन ऐगुन न बिचारो । धरनी भजि आयो सरनागति, तजि लज्जा कुल गारो ।—संतवाणी॰, पृ॰ १२८ ।

२. पहुँचना । प्राप्त होना । उ॰—चित्रकूट तब राम जू तज्यो । जाय यज्ञथल अत्रि को भज्यो ।—केशव (शब्द॰) ।

भजना पु क्रि॰ अ॰ [सं॰ व्रजन, प्रा॰ वजन पु॰ हिं॰ भजना] दौड़कर किसी स्थान से दूसरे स्थान को निकल जाना । भागना । उ॰— (क) शूरा के मैदान में कायर का क्या काम । कायर भाजै पीठि दै सूर करै संग्राम ।— कबीर (शब्द॰) । (ख) आवत देखि अधिक रव बाजी । चलेउ बराह मरुत गति भाजी ।— तुलसी (शब्द॰) । (ग) और मल्ल मारे शल तो- शल बहुत गए सब भाज । मल्ल युद्ध हरि करि गोपन सों लखि फूले ब्रजराज ।— सूर (शब्द॰) । (घ) भाल लाल बेंदी ललन आखत रहै बिराजि । इंदु कला कुज में बसी मनीं राह भय भाजि ।— बिहारी (शब्द॰) ।