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भभरना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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भभरना पु क्रि॰ अ॰ [हिं॰ भय या अनु॰]

१. भयभीत होना । डरना । उ॰—(क) समय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) तरि जात काम करि बरि जात कोप करि, कर्म कीलकाल तीन कंटक भभरि जात ।—सुंदर॰ ग्रं॰ (जी॰) भा॰ १, पृ॰ ९५ ।

२. घबरा जाना ।

३. भ्रम में पड़ना । उ॰—(क) अब ही सुधि भूलिहो मेरी भटू भभरौ जिन मीठी सी तानन में । कुल कानि जो आपनी राखो चहौ अँगुरी दै रहो दोउ कानन में ।—नेवाज (शब्द॰) । (ख) कहै पद्माकर सुमंद चलि कँधहू ते भ्रमि भ्रमि भाँई सी भुजा में त्यौं भभरि गो ।—पद्माकर (शब्द॰) ।