भानना
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]भानना पु ^१ क्रि॰ स॰ [सं॰ भञ्जन, भि॰ पं॰ भन्नना]
१. तोड़ना । भंग करना । उ॰—(क) तीन लोक मँह जे भट मानी । सब कै सकति शंभु धनु भानी ।— तुलसी (शब्द॰) । (ख) आपुहि करता आपुहि धरता आपु बनावत आपुहि भाने । ऐसो सूरदास के स्वामी ते गोपिन के हाथ बिकाने ।— सूर (शब्द॰) । (ग) सहसु बाहु अति बली बखान्यो । परशुराम ताको बल भान्यो ।—लल्लू (शब्द॰) ।
२. नष्ट करना । नाश करना । मिटाना । ध्वंस करना । उ॰—(क) आरत दीन अनाथन को हित मानत लौकिक कानि हौ । है परिनाम भलो तुलसी को सरनागत भय भानिहौ ।— तुलसी (शब्द॰) । (ख) भाने मठ कूप वाय सरवर को पानी । गौँरीकंत पूजत जह नव- तन दल आनी ।— तुलसी (शब्द॰) । (ग) जै जै जै जगदीस तूँ तूँ समर्थ साँई । सकल भवन भानै घड़ै दूजा को नाहीं ।— दादू॰, पृ॰ ५५० ।
३. हटाना । दूर करना । उ॰— (क) ढोटा एक भए कैसेहु करि कौन कौन करवर विधि भानी । कर्म कर्म करि अबलों उबरयो ताको मारि पितर दे पानी ।— सूर (शब्द॰) । (ख) नाक में पिनाक मिसि बामता बिलोकि राम रोको परलोक लीक भारी भ्रम भानिकै ।— तुलसी (शब्द॰) । (ग) मों सों मिलवांत चातुरी तू नहिं भानत भेद । कहे देत यह प्रगट ही प्रगटयो पूस प्रस्वेद ।— बिहारी (शब्द॰) ।
४. काटना । उ॰— (क) अति ही भई अवज्ञा जानी चक्र सूदर्शन मान्यो । करि निज भाव एक कुश तनु में क्षणक दुष्ट शिर भान्यो ।— सूर (शब्द॰) । (ख) अजहूँ सिय सौंपु नतरु बीस भुजा भानै । रघुपति यह पैज करी भूतल धरि प्रानै ।— सूर (शब्द॰) ।
भानना ^२ क्रि॰ स॰ [सं॰ भान(=प्रतीति), हिं॰ भान + ना (प्रत्य॰)] समझना । अनुमान करना । जानना । उ॰— भूत अपंची कृत औ कारज, इतनी सूछम सृष्टि पछान । पंचीकृत भूतन ते उपजेउ थूल पसारो सारो मान । कारण सूछम थूल देह अरु, पंचकोश इनहीं में जान । करि विवेक लखि आतम न्यारो, मूँज इर्ष्या काते ज्यों भान ।— निश्चलदास (शब्द॰) ।