भारङ्गी
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]भारंगी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ भारङ्गी] एक प्रकार का पौधा । बम्हनेटी । भृंगजा । असवरग । विशेष— यह बौधा मनुष्य के बराबर ऊँचा होता है । इसकी पत्तियाँ महुए की पत्तियों से मिलती हुई, गुदार और नरम होती हैं और लोग उनका साग बनाकर खाते हैं । इसका फूल सफेद होता है । इसकी जड़, डंठल, पत्ती और फल सब औषध के काम आते हैं । इसके फूल को 'गुल असवर्ग' कहते हैं । इसकी पत्तियों का प्रयोग ज्वर, दाह, हिचकी और त्रिदोष में होता है । वैद्यक में इसके मूल का गुण गरम, रुचिकर, दीपन लिखा है और स्वाद कड़वा और कसैला, चरपरा और रूखा बतलाया है जिसका प्रयोग ज्वरा, श्वास, खाँसी और गुल्मादि में होता है । पर्या॰—असबरग । ब्राह्मणी । पद्मा । भृंगजा । अंगारवल्लरी । ब्राह्मयष्टी । कंजी । दूर्वा ।