भुलाना
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]भुलाना ^१ क्रि॰ सं॰ [हिं॰ भूलना]
१. भूलने का प्रेरणार्थक रूप । भ्रप में डालना । धोखा देना । उ॰— बंधु कहत घर बैठे आवैं । अपनी माया माहि भुलावैं ।—लल्लू (शब्द॰) ।
२. भूलना । विस्मृत करना । उ॰—(क) हँसि हँसि बोली टेके काँधा । प्राति भुलाइ चहै जल बांधा ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) ये हैं जिन सुख वे दिए, करति क्यों न हित होस । ते सब अबहि भुलाइयतु तनक दृगन के दोस ।—पद्माकर (शब्द॰) ।
भुलाना पु ^२ † क्रि॰ अ॰
१. भ्रम में पड़ना । उ॰—(क) हाथ बीन सुनि मिरग भुलाहीं । नर मोहहिं सुनि पैग न जाहीं ।— जायसी (शब्द॰) । (ख) पँड़ित भुलान न जानहिं चालू । जीव लेत दिन पूछ न कालू ।—जायसी (शब्द॰) । (ग) यसुदा भरम भुलानी झूले पालना रे ।—गीत (शब्द॰) ।
२. भटकना । भरमना । राह भूलना । उ॰— सो सयान मारग रहि जाय । करै खोज कबहूँ न भुलाय ।— कबीर (शब्द॰) ।
३. भूल जाना । विस्मरण होना । विसरना । उ॰— (क) मात महातम मान भुलाना । मानत मानत गवना ठाना ।— कबीर (शब्द॰) । (ख) घड़ी अचेत होय जो आई । चेतन की सब चेत भुलाई ।—जायसी (शब्द॰) । (ग) एवमस्तु, कहि कपट मुनि बोला कुटिल कठोर । मिलब हमार भुलाब जनि कहहु त हमाहि न खोरि ।— तुलसी (शब्द॰) ।