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मवासी

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शब्दसागर

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मवासी ^१ संज्ञा स्त्री॰ [ हिं॰ मवास] छोटी गढ़ । गढी़ । उ॰— (क) जम ने जाइ पुकारिया डंडा दीया डारि । संत मवासी ह्वै रहा फाँसि न परै हमारि ।—कबीर (शब्द) । (ख) कोट किरीट किए मतिराम करै चढ़ि मोरपखानि मवासी ।— मतिराम (शब्द॰) । मुहा॰— मवासी तोड़ना= (१)गढ़ तोड़ना । (२) विजय करना । संग्राम जीतना । उ॰—कब दतै मवासी तोरी । कब सुकदेव तोपची जोरी ।—कबीर (शब्द॰) ।

मवासी ^२ संज्ञा पुं॰

१. गढ़पति । किलेदार । उ॰—(क) आइ मिले सब विकट मवासी । चुक्यौ अमल ज्यों रैयत खासी ।— लाला (शब्द॰) । (ख) हुते शत्रु जेते भए ते भिखारी । मवासे मवासीन की जोम झारी ।—सूदन (शब्द॰) ।

२. प्रधान । मुखिया । अधिनायक । उ॰—(क) गोरस चुराइ खाइ वदन दुराइ राखै मन न घरत वृंद्रावन को मवासी । सूर श्याम तोहि घर घर सब जानै इहाँ को है तिहारी दासी ।—सूर (शब्द॰) । (ख) वन मैं बंसी बजावत डोलत घर मैं भए हौ मवासी ।—घनानंद, पृ४४४ ।