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मष्ट

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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मष्ट वि॰ [सं॰ मष्ट, प्रा॰ मष्ट= मट्ट]

१. संस्कारशून्य । जो भूल गया हो ।

२. उदासीन । मौन । उ॰—(क) सो अवगुन कित कोजिए जिव दोजै जेहि काज । अव कहनो है कछु नहीं मष्ट भलो पखिराज । —जायसी (शब्द॰) सुनिहैं लोग मष्ट अबहुँ करि तुमहि कहाँ की लाज । सूर स्याम मेरौ माखन भोगी तुम आवति वेकाज ।—सूर॰, १० । ७७५ ।