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मसकना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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मसकना ^१ क्रि॰ स॰ [अनु॰]

१. खिचाव या दबाव में डालकर कपड़े को इस प्रकार फाड़ना कि वुनावट के सब तंतु टूटकर अलग हो जायँ ।

२. किसी चीज को इस प्रकार दबाना कि वह बीच मे से फट जाय या उसमें दरार पड़ जाय । उ॰— महावली वालि को दबतु दलकत भूमि तुलसी उछरि सिंधु मेरू मसकतु हैं । —तुलसी (शब्द॰) ।

३. जोर से दबाना । जोर से मलना । उ॰—सो सुख भाषि सकै अब को रिस कै कसकै मसकै छतियाँ छिये । राति की जागी प्रभात उठी अंग- रात जम्हात लजात लगी हिये । —पद्माकर (ग्रं॰, पृ॰ १७१) । ‡

४. वैलों को बलपूवक हाँकना । दौड़ाना । भगाना । उ॰— गाड़ी वारे मसकि दे बैल अबै पुरवैया के बादर ऊन आए ।—शुक्ल अभि॰ ग्रं॰, पृ॰ १५६ । संयो॰ क्रि॰— ड़ालना ।— देना ।

मसकना ^२ क्रि॰ अ॰ किसी पदार्थ का दबाव या खिचाव आदि के कारण बीच में फट जाना । जैसे,—कपड़ा मसक गया, दीवार मसक गई । संयो॰ क्रि॰— जाना ।

२. (चित्त का) चितित होना । दु:ख के कारण धसना । उ॰— राजकुमार धीरे से उसी स्थान पर बैठ गए । पूर्वकालीन वातें स्मरण होने लगीं ओर कलेजा मसकने लगा । —गदाधरसिंह (शब्द॰) ।