मिथ्यायोग
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]मिथ्यायोग संज्ञा पुं॰ [सं॰] चरक के अनुसार वह कार्य जो रूप, रस या प्रकृति आदि के विरुद्ध हो । जैसे, मल मूत्र आदि का वेग रोकना शरीर का मिथ्यायोग है, कठोर वचन आदि कहना वाणी का मिथ्यायोग है; तीव्र गंध आदि का सूँघना और भीषण शब्द आदि सुनना घ्राण और श्रवण का मिथ्यायोग है । उ॰— पुरुष का इष्ट नाशादि सुनना मिथ्यायोग है ।—माधव॰, पृ॰ १२९ ।