मुद्रा

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

मुद्रा स्त्री॰

  1. इसका अर्थ एक प्रकार के आकार से है। जिस प्रकार से हम धन को किसी आकर के द्वारा पहचानते हैं की यह सही है या नहीं। उसी प्रकार इस शब्द का उपयोग आकार के लिए किया जाता है। यदि हम खड़े हो जाते हैं तो वह हमारी खड़े रहते समय की एक मुद्रा कहलाएगी। सिक्कों का आकार भिन्न भिन्न होता है। उसे भी मुद्रा कहते हैं। सभी देशों की अलग अलग मुद्रा होती हैं।

उदाहरण[सम्पादन]

  1. क्या आप इस तरह की मुद्रा में रह सकते हैं?
  2. आपके पास किस देश की मुद्रा है?
  3. मेरे पास बहुत सी मुद्रायेँ हैं।

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मुद्रा संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. किसी के नाम की छाप । मोहर । उ॰— मुद्रित मसुद्र सात मुद्रा निज मुद्रित कै, आई दिसि दसो जीति सेना रधुनाथ की ।—केशव (शब्द॰) ।

२. रुपया, अशरफी आदी । सिक्का ।

३. अँगूठी । छाप । छला । उ॰—बनचर कौन देश तें आयो । कहँ वे राम कहाँ व् लछिमन क्यें करि मुद्रा पायो ।—सूर (शब्द॰) ।

४. टाइप के छपे हुए अक्षर ।

५. गोरखपंथी साधूओं के पहनने का एक कर्णभूषण जो प्रायः काँच वा स्फटिक का होता है । यह कान की लौ के बीच में एक बड़ा छेड करके पहना जाता है । उ॰—(क) श्रृंगी मुद्रा कनक खपर लै करिहौं जोगिन भेस ।—सूर (शब्द॰) । (ख) भसम लगाऊँ गात, चंदन उतारों तात, कुंडल उतारों मुद्रा कान पहिराय द्यौं ।—हनुमान (शब्द॰) ।

६. हाथ, पाँव, आँख, मुँह, गर्दन आदि की कोइ स्थिति ।

७. बैठने, ले़टने या खड़े होने का कोइ ढंग । अंगों की कोई स्थिति ।

८. चेहरे का ढंग । मुख की आकृति । मुख की चेष्टा । उ॰—मायावती अकेले इस बाग में टहल रही थी और एक ऐसी मुद्रा बनाए हुए थी, जिससे मालूम होता था कि किसी बड़े गंभीर विचार में मग्न है । बालकृष्ण (शब्द॰) ।

९. विष्णु के आयुवों के चिह्न जो प्रायः भक्त लोग अपने शरीर पर तिलक आदि के रूप में अंकित करते हैं या गरम लोहे से दगाते हैं । जैसे, शंख, चक्र, गदा के ( चिह्न) । छाप ।

१०. तात्रिकों के अनुसार कोई भूना हुआ अन्न ।

११. तंत्र में उँगलियों आदि की अनेक रूपों की स्थिति जो किसी देवता के पूजन में बनाई जाती है । जैसे, धेनुमुद्रा, योनिमुद्रा ।

१२. हठ योग में विशेष । अंग- विन्यास । ये मुद्राएँ पाँच होती है । जैसे,—खेचरी, भूचरी, चाचरी, गोचरी और उनमुनी ।

१३. अगस्त्य ऋषि की स्त्री, लोपामुद्रा ।

१४. वह अलंकार जिसमे प्रकृत अर्थ के अतिरिक्त रचना में कुछ और भी साभि प्राय नाम निकलते हैं । जैसे,—कत लपटैयत मोगरे सोन जुही निसि सैन । जेहि चंपकबरनी किए गुल आनार रँग नैन ।—विहारी (शब्द॰) । इस पद्य में प्रकृत अर्थ के अतिक्ति 'मोग रा', 'सोनजुही', 'चंपक' इत्यादि फूलों के नाम भी निकलते हैं ।

१५. कहीं जाने का आज्ञापत्र या परवाता । परवाना राहदारी ।