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मूँज

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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मूँज संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ मुञ्ज] एक प्रकार का तृण । उ॰—जैसे, सोने की सिकड़ी में लोहे की घंटी और दरियाई की अँगिया में मूँज की बखिया ।—भारतेंदु ग्रं॰ भा॰ १, पृ॰ ३७७ । विशेष—इसमें डंठल या टहनियाँ नहीं होती; जड़ से बहुत ही पतली (जौ भर से कम चौड़ी) दो दो हाथ लंबी पत्तियाँ चारों और निकली रहती हैं । ये पत्तियाँ बहुत घनी निकलती हैं । जिससे पौधा बहुत सा स्थान घेरता है पत्तियों के मध्य में एक सूत्र यहाँ से वहाँ तक रहता है । पौधे के बीजोबीच स े एक सीधा कांड पतली छड़ के रूप में ऊपर निकलता है जिसके सिरे पर मंजरी या धूए के रूप में फूल लगते हैं । सरकंडे से इसमें यह भेद होता है कि इसमें गाँठें नहीं होतीं और छाल वड़ी चमकीली तथा चिकनी होती है । सींक से यह छाल उतारकर बहुत सुंदर सुंदर डलियाँ बुनी जाती हैं । मूँज प्रायः ऊँचे ढालुएँ स्थानों पर बगीचे की बाढ़ीं या ऊँची मेंड़ों पर लगाई जाती है । मूँज बहुत पवित्र मानी जाती है । ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार के समय वटु को मुंजमेखला (मूँज को करवनी) पहनाने का विधान है । पर्या॰—मौंजीतृण । ब्राह्मण्य । तेजनाह्वय । वानीरक । मुंजनक । शीरी । दर्भाद्वय । दूरमूल । दृढमूल । वटुप्रज । रंजन । शत्रुभंग ।