मूसाकानी
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]मूसाकानी लता । आखुग, आखुपत्र, आखुभुक् = बिलार । आखुरथ = आखुवाहन = गणेश ।
२. देवताल । देवहाड ।
३. सूअर । शूकर ।
४. कुदाल । फावड़ा [को॰] ।
५. चोर [को॰] ।
६. कृपण । कंजुस [को॰] ।
मूसाकानी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ मूषाकर्णी] औषध में प्रयुक्त होनेवाली एक प्रकार की लता जो प्रायः सारे भारत की गीली भूमि में चौमासे में पाई जाती है । चूहाकानी । आखुकर्णी । विशेष—इस लता की पत्तियाँ आकार में गोल प्रायः आधा से डेढ़ इंच तक की होती हैं, जो देखने में चूहे के कान के समान, वीच में कमानदार और रोएँदार होती हैं । इसकी शाखाएँ बहुत घनी होती हैं और इसकी गाँठों में से जड़ निकलकर जमीन में जम जाती है । इसमें बैंगनी या गुलाबी रंग के छोटे छोटे फूल और चने के समान गोल फल लगते हैं जो पहले हरे अथवा बैंगनी रंग के और पकने पर भूरे रंग के हो जाते हैं । ये फल चीरने पर दो दलों में विभक्त हो जाते हैं और प्रत्येक दल में से एक बीज निकलता है । इसके प्रायः सभी अंग औषधि के रूप में काम में आते हैं । विशेषतः चूहे के विष को दूर करने के लिये इसे लगाया और इसका काढा़ पीया जाता है । वैद्यक में यह चरपरी, कड़वी, कसैली, शीतल, हलकी, दस्तावर, रसायन तथा कफ, पित्त, कृमि, शूल, ज्वर, ग्रंथि, सूजाक, प्रमेह, पांडु, भगंदर और कोढ़ आदि रोगों को दूर करनेवाली मानी जाती है । मूत्ररोग, उदररोग, हृदय- रोग आदि में भी् इसका व्यवहार होता है और यह रक्तशोधक भी होती है । यह बड़ा और छोटी दो प्रकार की होती है । इसके अतिरिक्त इसके और भी कई भेद होते हैं, जिनमें से एक भेद के पत्ते गोभी के पत्तों की तरह लंबे और किनारे पर कटाबदार होते हैं । एक और भेद क्षुप जाति का होता है, जो एक से चार फुट तक ऊँचा होता है । इसका डंठल पीला होता है, जिसमें से बहुत सी शाखाएँ निकलती हैं । इन सबका व्यवहार पथरी के समान होता है । इसे 'चूहाकानी' भी कहते हैं । पर्या॰—आखुकर्णी । द्रवंती । मूषिकपर्णी । मूषिकाहृदा । उंदरकर्णी ।