मोहिँ
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]मोहिँ सर्व॰ पुं॰ [सं॰ मह्यम्, प्रा॰ मरुह, मज्झं] ब्रजभाषा और अवधी के उत्तम पुरुष 'मैं' का वह रुप जो पहले सब कारकों में आता था । पर पीछे कर्म और संप्रदान में भी आने लगा । मुझको । मुझे । उ॰—(क) मरुँ पर माँगीं नहीं अपने तन के काज । परमारथ के कारनै मोहिं न आवै लाज ।—सुर (शब्द॰) । (ख) नैना कह्यौ न मानौ मेरो । हारि मानि कै रही मौन ह्वै निकट सुनत नहि टेरो । ऐसे भए मनो नहिं मेरे जबहि श्याम मुख हेरो । मैं पछताति जबहिं सुधि आवति ज्यों दीन्हों मोहिं डेरो ।—सुर (शब्द॰) ।