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रजनीमुख

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शब्दसागर

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रजनीमुख संज्ञा पुं॰ [सं॰] संध्या । सायंकाल । शाम का वक्त । उ॰—(क) बहुरि भोग धरि रजनीमुख में । सैनारती करै भरि सुख में ।—गिरधर (शब्द॰) । (ख) प्रविश्यौ पवन तनय रजनी मुख लंक निशंक अकेला ।—रघुराज (शब्द॰) । (ग) दिन उठि जात धेनु बन चारन गोप सखन के संग । वासर गत रजनीमुख आवत करत नैन गति पंग ।—सूर (शब्द॰) । (घ) रजनीमुख आवत गुन गावत नारद तुंबुर माउँ ।—सूर (शब्द॰) ।