राँगा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

राँगा संज्ञा पुं॰ [सं॰ रड्गा] एक प्रसिद्ध धातु । त्रपु । विशेष—वह बहुत नरम ओर रंग में सफेद होती है । यह पीटकर पत्तर के रूप नें की जा सकती है । यह प्रायः कई दूसरे पदार्थो के साथ पहाड़ों को दरारों तथा नदियों के किनारे पाई जाती है । यह भारत में केवल बरमा में मिलती है; ओर मलाया प्रायद्वीप तथा आस्ट्रेलिया आदि में बहुत मिलती बै । यह बहुत साधारण आँच पाकर भी गल जाती है; इसीलिये इसका व्यवहार प्रायः फूल ओर भरत आदि मिश्रित धातुएं बनाने में होता है । ताँबे के बरतनों पर इसी धातु से कलई की जाती है जिससे इसे कलई भी कहते हैं । वैद्यक में इस कटु, तिक्त, शीतल, कपाय, लवण रस और मेह, कृमि, पांडु तथा दाह आदि का नाशक, कांतिवर्धक और रसायन माना है । इसे शोधकर ओर भस्म बनाकर अनेक प्रकार के रोगों में देते हैं । पर्या॰—रंग । वंग । त्रपु । नाग । त्रपुप । मधुर । हिम । पूतिगंध कुरूप्य । स्वर्णज । कुरुपत्री । तमर । नागजीवन । चक्र । स्ववेत ।