सामग्री पर जाएँ

राचना

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

[सम्पादित करें]

शब्दसागर

[सम्पादित करें]

राचना पु † क्रि॰ स॰ [हि॰ रचना] रचना । बनाना । उ॰— (क) बे चूने जग राचिया साई नूर निनार । तब आखिर के बखत में किसका करूँ दिदार ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) कोटि इंद्र छिन ही में राचै छिन में करै बिनास । सूर रच्यो उनहीं को सुरपति मैं भूली तेहि आस ।—सूर (शब्द॰) । (ग) धनि धनि सूरदास के स्वामी अदभुत राच्यो राम ।—सूर (शब्द॰) । (घ) विशद विहंगन की वाणी राग राचती सी नाचती तरग ऐन आनंद बधाई सी ।—पद्माकर (शब्द॰) ।

राचना पु ^२ क्रि॰ अ॰ रचा जाना । बनना ।

राचना पु ^३ क्रि॰ अ॰ [सं॰ रज्जन]

१. रँगा जाना । रंग पकड़ना । रंजित होना । उ॰—प्रेम माने कछु सुधे न रही अँग रहे श्याम रँग राची ।—सूर (शब्द॰) । (ख) तो रस राच्यो आन बस, कझो कुटल मति कूर । जाभ निबौरी क्यों लगै, बौरी चाखि खजूर ।—बिहारी (शब्द॰) । (ग) राची भूमि हरित हरित तृण जालन सों बिच खात त्यों फहारन सो छहरात । देव स्वामी— (शब्द॰) ।

२. अनुरक्त होना । प्रेम करना । उ॰—(क) पर नारी के राचंने सूधो नरकै जाय । यम ताको छँडे़ नहीं कोटिन करै उपाय ।—कबीर (शब्द॰) । (ग) बिरचि मन बहुरि राच्यो आइ । टूटी जुरै बहुत जतननि करि तऊ दोष नहिं जाइ ।—सूर (शब्द॰) । (ग) वहाकि बड़ाई आपनी कत राचत मति भूल । बिन मधु मधुकर के हिए गडै़ न गुडहर फूल ।—बिहारी (शब्द॰) ।

३. लीन होना । मग्न होना । डूबना । उ॰—(क) जग जहदा में राचिया झूठे कुल की लाज । तन छीजैं कुल विनासिहै रटै न राम जहाज ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) कछु कुल धर्म न जानई वाके रू प सकल जग राच्यो । बिनु देखे बिनु ही सुने ठगत न कोऊ बाच्यो ।—सूर (शब्द॰) ।

४. प्रसन्न होना । उ॰—(क) जय जय तिहुँ पुर जयमाल राम उर वरयैं सुमन सुर रूरे रूप राचहीं ।—तुलती (शब्द॰) । (ख) प्रमान मान नाचहीं । अमान मान राचहीं । समान मान पावहीं । विमान मान धावहीं ।—केशव (शब्द॰) ।

५. शोभा देना । भला जान पड़ना । उ॰—आँच न चद्रकला बिच राचत साँच न चारिन के चरसा में ।—मतिराम (शब्द॰) ।

६. प्रभावान्वित होना । सोच में या चिता मे पड़ना । उ॰—शोत उष्ण सुख दुख नहि मानै गानि भए कछु सोच न रैचै । जाइ समाइ सूर वा निधि में बहुरि न उलटि जगत में नाचै ।—सूर (शब्द॰) ।