राजसूय
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]राजसूय संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]
१. एक यज्ञ का नाम । विशेष— इस यज्ञ के करने का आधिकार केवल ऐसे राजा को होता है, जिसने वाजपेय यज्ञ न किया हो । यह यज्ञ करने से राजा सम्राट् पद का अघिकारी होता है । यह यज्ञ बहुत दिनों तब होता है और इसे अनेक यज्ञों और कृत्यों की समष्टि की कहना ठीक है । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार इष्टि, पशु, सोम और दार्वी होम इसके प्रधान अंग हैं । इसका प्रारंभ पवित्र नामक सोमयाग से होता है और सौत्रामणी से इसकी समाप्ति होती है । इसके बीच में दस संसृप, अभीषेचनीय, मरुत्वती, दिग्विजय, बृहस्पति सबन, बृहविधनि, द्यूत क्रीड़ आदि अनेक कृत्य होते हैं । इसस े ऋत्किज् लोग एक ऊँचे मच पर व्याघ्रचर्म बिछाकर और उसपर सिंहासन रखकर राजा को अभीषेक कराकर बैठाते हैं और चारो ओर से उसे घेरकर प्रशस्ति सुनाते हैं । फिर राजा उन्हें दक्षिणा देकर दिग्विजय के लिये प्रस्थान करता है; और उसके लौटने पर फिर उसे मंच बैठकर प्रशस्तिगान होता है । तदनंतर सभा में द्यूतक्रीड़ा होती है; और अंत को सौत्रमणी याग के बाद कृत्य समाप्त होता है । प्राचीन काल में केवल बड़े बड़े राजा ही यह यज्ञ करते थे ।
२. एक प्रकार का कमल (को॰) ।
३. एक पहाड़ (को॰) ।