रूसा
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]रूसा पु † ^१ वि॰ [सं॰ रुष् (= रोष) ] [वि॰ स्त्री॰ रूषी] रूठा हुआ । रुष्ट । उ॰—श्याम अचानक आए री । पाछे ते लोचन दोउ मूँदे मो को हृदय लगाए री । लहनो ताको जाके आवं मैं बड़- भागिनि पाए री । यह उपकार तुम्हारो सजनी रूसे कान्ह मिलाए री ।—सूर (शब्द॰) ।
रूसा ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ रूषक] अडूसा । अरूसा । विशेष दे॰ 'अड़ूसा' ।
रूसा ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰ रोहिष] एक सुगंधित घास का नाम । भूतृण । रोहिष । विशेष—यह घास नेपाल, शिमला, अलमोड़ा, काश्मीर, पंजाब, राजमहल, मध्यप्रदेश के पहाड़ी प्रदेशों, बंबई और मद्रास के पर्वतों में होती है । इस घास से गुलाब की सी सुगंध आती है और इसका तेल निकाला जाता है । इसकी प्रधान दो जातियाँ होती हैं । एक का फूल सफेद और दूसरी का फूल नीले रंग का होता है । जब यह घास नरम रहती है, तब इसकी पत्तियों का रंग नीलापन लिए होता है, पर पकने पर उनका रंग लाल हो जाता है । जब इसकी पत्तिया नरम होती हैं, तब इसे 'मोतिया' कहते हैं; और जब पककर लाल हो जाती हैं, तब उन्हें 'सौंफिया' कहते हैं । सावन भादा में यह फूलने लगती है और कार्तिक अगहन तक फूलती है । इसी समय इसकी पत्तियाँ तेल निकालने के योग्य हो जाती हैं । जब घास फूलने लगती है, तब काट ली जाती है और इसकी छोटी छोटी पूलियाँ बाँध ली जाती हैं । तेल निकालते समय देग में पानी भरकर ढाई तीन सौ पूलियाँ उसमें छोड़ दी जाती हैं । फिर देग पर सरपोश लगा देते हैं, जिसमें दो नलियाँ, जो तीन चार अंगुल मोटी और चार हाथ लंबी होती हैं, लगी रहती हैं । यह देग आग पर रख दिया जाता है और नलियों का सिरा ताबे के दो घड़ों के मुँह से लगा दिया जाता है, जो पानी में डूबे रहते हैं । इस प्रकार घास का आसव खींचा जाता है । जब आसव निकल आता है, तब उसे एक चौड़े मुँह के बरतन में उंडेल लेते हैं । इस बरतन में रूसे का अर्क थोड़ी देर तक रहता है और तेल छोटे चम्मच से धीरे धीरे ऊपर से काछ लिया जाता है । यह तेल गुलाब के अतर में मिलाया जाता है और इसमें ताड़पी न या मिट्टी का तेल मिलाकर सुगंधित द्रव्य तैयार किया जाता है । मध्यप्रदेश के जंगलों से रूसा का तेल बहुत अधिक मात्रा में बाहर जाता है । यूरोप और अमेरिका में इस तेल का बहूत व्यवहार तथा व्यापार होता है । पर्या॰—रोहिष । गंधवेना । भूतृण । कत्तृण । गंधतृण ।