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रूही

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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रूही पु संज्ञा पुं॰ [हिं॰ रोआँ का स्त्री॰ रोई] रोम । लोम । रोआँ । उ॰—वै ब्रह्मा । विष्णु महेश प्रलै मैं जिसदी पुसै न रूही ।—सुंदर ग्रं॰, भा॰

१. पृ॰ २७६ ।

रूही संज्ञा स्त्री॰ [देश॰] एक प्रकार का वृक्ष । अर्कमूल । चौरी । ईसर मूल । विशेष—रूही का वृक्ष हिमालय पर्वत के नीचे रावी नदी के पूर्व में तथा मध्यभारत और मद्रास प्रांत में पाया जाता है । इसे चौरी और मामरी भी कहते हैं । इसकी छाल देशी औषधियों में काम आती है और जड़ साँप काटने की ओषधि मानी जाती है । इसकी लकड़ी तौल में प्रति धनफुट २७ सेर तक होती है । यह बहुत मजबूत और चिकनी होती है । रंग देने और वार्निश करने से इसपर बहुत अच्छी चमक आती है । इससे मेज, कुरसी, आलमारी और तसवीर के चौखटे बनाए जाते हैं । यह वृक्ष बीज से बरसात में उगता है । इसको संस्कृत में 'अहिगंधा' कहते हैं । इसकी पत्तियाँ उत्तेजक और कटु होती हैं । इसकी छाल पेट की पीड़ा और अँतरिया ज्वर में दी जाती है । इसकी मात्रा ३ माशे से ६ माशे तक है । यह मधु के साथ कुष्ठ रोग में और काली मिर्च के साथ पीसकर विशूचिका तथा अतिसार में दी जाती है । इसे वैद्य लोग ईसरमूल, अर्कमूल और रूहीमूल कहते हैं ।