लंगर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

लंगर ^१ संज्ञा पुं॰ [फा़॰ । मि॰ अं॰ एन्कर]

१. बड़ी बड़ी नावों या जहाजों को रोक रखने के लिये लोहे का बना हुआ एक प्रकार का बहुत बड़ा काँटा । विशेष—इस काँटे या लंगर के बीच में एक मोटा लंबा छड़ होता है, और एक सिरे पर दो, तीन या चार टेढ़ी, झुकी हुई नुकीली शाखाएँ और दूसरे सिरे पर एक मजबूत कड़ा लगा हुआ होता है । इसका व्यवहार बड़ी बड़ी नावों या जहाजों को जल में किसी एक ही स्थान पर ठहराए रखने के लिये होता है । इसके ऊपर कड़े में मोटा रस्सा या जंजीर आदि बाँधकर इसे नीचे पानी में छोड़ देते हैं । जब यह तल में पहुँच जाता है, तब इसके टेढ़े अंकुड़े जमीन के ककड़ पत्थरों में अड़ जाते हैं, जिसके कारण नाव या जहाज उसी स्थान पर रुक जाता है, और जबतक यह फिर खींचकर ऊपर नहीं उठा लिया जाता, तबतक नाव या जहाज आगे नही बढ़ सकता । क्रि॰ प्र॰—उठाना ।—करना ।—छोड़ना ।—डालना ।— फेंकना ।—होना । यौ॰—लंगरगाह ।

२. लकड़ी का वह कुंदा जो किसी हरहाई गाय के गले में रस्सी द्वारा बाँध दिया जाता है । इसके बाँधने से गाय इधर उधर भाग नहीं सकती । ठेंगुर ।

३. रस्सी या तार आदि से बँधी और लटकती हुई कोई भारी चीज, जिसका व्यवहार कई प्रकार की कलों में और विशेषतः बड़ी घड़ियों आदि में होता है । क्रि॰ प्र॰—चलना ।—चलाना ।—हिलाना । विशेष—इस प्रकार का लंगर प्रायः निरतर एक ओर से दूसरी ओर आता जाता रहता है । कुछ कलों में इसका व्यवहार ऐसे पुरजों का भार ठीक रखने में होता है, जो एक ओर बहुत भारी होते हैं और प्रायः इधर उधर हटते बढ़ते रहते हैं, बड़ी धड़ियों में जो लंगर होता है, वह चाभी दी हुई कमानी के जोर से एक सीधी रेखा में इधर से उधर चलता रहता है और घड़ी की गति ठीक रखता है ।

४. जहाजों में का मोटा बड़ा रस्सा ।

५. लोहे की मोटी और भारी जंजीर । उ॰—हाथी ते उररि हाड़ा जूझो लोह लंगर दै एती लाज का में जेती लाज छत्रसाल में ।—भूषण (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—डालना ।—देना ।

६. चाँदी का बना हुआ तोड़ा जो पैर में पहना जाता है । इसकी बनावट जंजीर की सी होती है ।

७. किसी पदार्थ के नीचे का वह अंश जो मोटा और भारी हो ।

८. कमर के नीचे का भाग ।

९. अंडकोश । (बाजारू) ।

१०. पहलवानों का लँगोट । मुहा॰—लंगर बाँधना = (१) पहलवानी करना । (२) ब्रह्म- चर्य धारण करना । लगर लँगोट कसना या बाँधना = लड़ने को तैयार होना । लँगर लँगोट (किसी को) देना या आगे रखना = पहलवानी सीखने के लिये किसी पहलवान का शिष्य बनना ।

११. वह (स्थान या व्यक्ति आदि) जिसके द्वारा किसी को किसी प्रकार का आश्रय या सहारा मिलता हो । (क्क॰) ।

१२. कपड़े में के वे टाँके जो दूर दूर पर इसलिये डाले जाते हैं जिसमें मोड़ा हुआ कपड़ा अथवा एक साथ सीए जानेवाले दो कपड़े अपने स्थान से हट न जाय । विशेष—इस प्रकार के टाँके पक्की सिलाई करने से पहले डाले जाते हैं, और इसीलिये इसे कच्ची सिलाई भी कहते हैं ।

लंगर ^२ वि॰

१. जिसमें अधिक बोझ हो । भारी । वजनी ।

२. शरीर । नटखट । दाँठ । उ॰—(क) लरिका लंबे के मिसान लगर मो ढिग आय । गयौ अचानक आँगुरी छाती छल छुवाय ।— बिहारी (शब्द॰) । (ख) सूर श्याम दिन दिन लंगर भयो दूरि करौं लँगरैया ।—सूर (शब्द॰) । मुहा॰—लगर करना = शररात या ढिठाई करना । उ॰—बोलि लियो बलरामहिं यशुमति । आवहु लाल सुनहु हरि के गुण कालिहिं ते लँगरयो करत अति ।—सूर (शब्द॰) ।

लंगर ^३ वि॰ [हिं॰ लँगड़ा] दे॰ 'लँगड़ा' ।