लरजना
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]लरजना क्रि॰ अ॰ [फा॰ लरजा (=कंप)]
१. काँपना । हिलना । उ॰—(क) पात बिनु कीन्हें ऐसी भाँति गन वेलिन के, परत न चीन्हें जे ये लरजत लुंज हैं ।—पद्माकर (शब्द॰) । (ख) चंचला चमाकै चहुँ ओरन ते चाह भरी, चरज गई ती फेर चरजन लागी री । कहै पद्माकर लवंगन की लोनी लता, लरज गई ती फेर लरजन लागी री ।—पद्माकर (शब्द॰) । संयो क्रि॰—उठना ।—जाना ।
२. भयभीत होना । दहल जाना । डरना । उ॰—(क) शरण राखि ले हो नंदताता । घटा आई गरजि, युवति गई मन लरजि, बीजु चमकति तरजि, डरत गाता ।—सूर (शब्द॰) । (ख) लाजन हौं लरजों गहिरी बरजों गहिरी कहिरी किहि दाइन ।—देव (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—उठना ।—जाना ।—पड़ना ।