लाख

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हिन्दी[सम्पादन]

विशेषण[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

संख्या १,००,०००

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

लाख ^१ वि॰ [सं॰ लक्ष, प्रा॰ लक्ख]

१. सौ हजार । उ॰—लाखन हू की भीर से आँखि वहीं चलि जाहिं । (शब्द॰) ।

२. (लक्षणा से) बहुत अधिक । गिनती में बहुत ज्यादा । मुहा॰—लाख टके की बात = अत्यंत उपयोगी बात ।

लाख ^२ संज्ञा पुं॰ सौ हजार की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है ।—१,॰॰,॰॰० ।

लाख ^३ क्रि॰ वि॰ बहुत । अधिक । जैसे,—तुम लाख कहो, मैं एक न मानूँगा । मुहा॰—लाख से लीख होना = अत्यधिक से अत्यल्प हो जाना । सब कुछ से कुछ न रह जाना । उ॰—बहुतक भुवन सोह अँतरीखा । रहे जो लाख भए ते लीखा ।—जायसी (शब्द॰) । लाख का घर राख होना = लाख रुपए का घर या खानदान नाश होना ।

लाख ^४ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ लाक्षा]

१. एक प्रकार का प्रसिद्ध लाल पदार्थ जो पलास, पीपल, कुसुम, बेर, अरहर आदि अनेक प्रकार के वृक्षों की टहनियों पर कई प्रकार के कीड़ों से बनता है । लाह । विशेष—एक प्रकार के बहुत छोटे कीड़े होते हैं, जिनकी कई जातियाँ होती हैं । ये कीड़े या तो कुछ वृक्षों पर आपसे आप हो जाते हैं या इसी लाल पदार्थ के लिये पाले जाते हैं । वृक्षों पर ये कीड़े अपने शरीर से एक प्रकार का लसदार पदार्थ निकालकर उससे घर बनाते हैं और उसी में बहुत अधिक अंडे देते हैं । कीड़े पालनेवाले बैसाख और अगहन में वृक्षों की शाखाओं पर से खुरचकर यह लाल द्रव्य निकाल लेते हैं और तब इसे कई तरह से साफ करके काम में लाते हैं । इससे कई प्रकार के रंग, तेल, वारनिश और चूड़ियाँ, कुमकुमे आदि द्रव्य बनते हैं । चमड़ा भी इसी से तैयार होता है । लाख केवल भारत में ही होती है; और कहीं नहीं होती । यहीं से यह सारे संसार में जाती है । यहाँ इसका व्यवहार बहुत प्राचीन काल से, संभवतः वैदिक काल से, होता आया है । पहले यहाँ इसमें कपड़े और चमड़े आदि रँगते थे और पैर में लगाने के लिये अलता या महावर बनाते थे । वैद्यक में इसे कटु, स्निग्ध, कपाय, हलकी, शीतल, बलकारक और कफ, रक्तपित्त, हिचकी, खाँसी, ज्वर, विसर्प, कुष्ठ, रुधिरविकार आदि को दूर करनेवाली माना है । पर्या॰—कीटजा । रक्तमातृका । अलक्तक । जतुका ।

२. लाल रंग के वे बहुत छोटे छोटे कीड़े जिनसे उक्त द्रव्य निकलता है । इसकी कई जातियाँ होती हैं ।

यह भी देखिए[सम्पादन]