लोकञ्जन
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]लोकंजन पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ लोपञ्जन या हिं॰ लुकना + अंजन] वह कल्पित अंजन जिसे आँख में लगाने से मनुष्य का अदृश्य होना माना जाता है । लोपांजन । उ॰—जो कहिए बिधना ही रची सिख तें धर क्यों पग की सँग लीन्हो । जो कहिए कि विरंचि रची है तौ देखी न जाति किती दृग दीन्हो । कीन्हे बिचार न आवै भनै नृप संभु भनै तब मो मति चीन्हो । जो चितचोर को चित चुरावत राधे के लंक लोकंजन कीन्हो ।—शंभु (शब्द॰) ।