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वत्सनाभ

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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वत्सनाभ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. एक विष जिसे 'बछनाग' या 'बच्छनाग' भी कहते हैं । मीठा जहर । विशेष—इसका पौधा हिमालय के कम ठंढे भागों में होता है । इसकी जड़ विशेषतः नैपाल से आती है । इसके पत्ते सँभालू के पत्तों के समान होते हैं । विष जड़ में होता है । यह विष शोधकर औषधों में दिया जाता है । शोधन के लिये जड़ के छोटे छोट े टुकड़े काटकर तीन दिन तक गोमूत्र में भिगोते हैं । फिर छाल अलग करके लाल सरसों के तेल में भिगोए हुए कपड़े में पोटली बाँधकर रखते हैं । उपयुक्त मात्रा और युक्ति के साथ सेवन करने से यह रसायन, योगवाही, वातनाशक और त्रिदोषघ्न कहा गया है । वैद्य लोग इसे ज्वर और लकवा रोग में देते हैं । इसके प्रयोग में बड़ी सावधानी चाहिए; क्योंकि अधिक मात्रा में होने से यह विष प्राणनाशक होता है । इसके योग से मृत्युंजय रस, आनदभैरव रस, पंचवक्त्र रस आदि कई प्रसिद्ध औषधें बनती हैं । पर्या॰—अमृत । विष । उग्र । महौषध । गरल । मारण । नाग । ल्तोकक । प्राणहारक । स्थावर ।

२. एक वृक्ष का नाम ।