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शूली

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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शूली ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ शूलिन्]

१. त्रिशूल धारण करनेवाले, शिव । महादेव । उ॰—श्रृंगी शूली धूरजटी, कुंडलीश त्रिपुरारि । वृषा कपर्दी मानहर, मृत्युंजय कामारि ।—सबल (शब्द॰) ।

२. खरगोश । शशक । खरहा ।

३. शूलरोग से पीड़ित व्यक्ति । वह जिसे शूलरोग हुआ हो ।

४. एक नरक का नाम । उ॰—(क) तेरहों शूली नरक कहावै । शूली सम दुख तामे पावै । जो नर पाप करै अधिकाई । करि शिकार मृग मारै जाई ।—विश्राम (शब्द॰) । (ख)—काहू को शस्त्रन ते मारै । तेहि यम शूली नरक में डारै ।—विश्राम (शब्द॰) ।

५. कुंतधारी व्यक्ति । वह जो शूल धारण किए हो (को॰) ।

शूली ^२ संज्ञा स्त्री॰ दे॰ 'सुली' । उ॰—नाहक नर शूली धरि दीन्हों । जिन बन माहिं ठगाही कीन्हों ।—विश्राम (शब्द॰) । (ख) कौन पाप मैं ऐसो कियो । जाते मोकूँ शूली दियो ।— सूर (शब्द॰) ।

शूली ^३ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ शूल] पीड़ा । शूल । उ॰—सो सुधि भूप हिये महँ भूली । अजहूँ उठत जासु ते शूली ।—सबल (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—उठना ।

शूली ^४ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] एक प्रकार की घास । शूलीपत्री । विशेष—इस घास को पशु बड़े चाव से खाते हैं और इसका व्यवहार औषध रूप में भी होता है । वैद्यक के अनुसार यह किंचित उष्ण गुरु, बलकारक, पित्त तथा दाहनाशक और गौओं तथा भैसों का दूध बढ़ानेवाली मानी जाती ।