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संयो

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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संयो क्रि॰—जाना । मुहा॰—बढ़कर चलना = इतराना । घमंड करना । बढ़ बढ़कर बात बनाना = डींग मारना । शेखी बघारना । गुस्ताखी करना । उ॰—जरा शेख जी बढ़ बढ़कर बातें न बनाया कीजिए ।—फिसाना॰, भा॰, १, पृ॰ १० । बढ़कर बोलना या बढ़ बढ़कर बोलना = दे॰ 'बढ़ बढ़कर बातें बनाना' । यौ॰—बढ़ा बढ़ी = बढ़ बढ़कर बातें करना । अपनी सीमा भूलकर कुछ कहना या करना । गुस्ताखी करना । उ॰—यह तुम्हारी बढ़ा बढ़ी मैं सहन नहीं कर सकता ।अजात॰, पृ॰ २४ ।

५. किसी स्थान से आगे जाना । स्थान छोड़कर आगे गमन करना । अग्रसर होना । चलना । जैसे,—(क) तुम बढ़ो तब तो पीछे के लोग चलें । (ख) बढ़े आओ, बढ़े आओ । संयो क्रि॰—आना—जाना । मुहा॰—पतग बढ़ना = पतंग का और ऊँचाई पर जाना ।

६. चलने में किसी से आगे निकल जाना । जैसे,—दौड़ने में वह तुमसे बढ़ जायगा । संयो॰ क्रि॰—जाना ।

७. कीसी से किसी बात में अधिक हो जाना । जैसे,—पढ़ने में वह तुमसे बढ़ जाएगा । यौ॰—बढ़ चढ़कर, या बढ़ा चढ़ा = अधिक उन्नत । विशेषतर ।

८. भाव का बढ़ना । खरीदने में ज्यादा मिलना । सस्ता होना । जैसे,—आजकल अनाज बढ़ गया है । संयो॰ क्रि॰—जाना ।

९. लाभ होना । मुनाफे में मिलना । जैसे,—कहो, क्या बढ़ा ।

१०. दुकान आदि का समेटा जाना । बंद होना । जैसे, पुजापा बढ़ना, दुकान बढ़ना । विशेष—'बंद होना' अमंगलसूचक समझकर लोग इस क्रिया का व्यवहार करने लगे हैं ।

११. दीपक का निर्वाप्त होना । चिराग का वुझना । उ॰—ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कुपूत गति सोय । बारे उजियारी लगै, बढ़े अँधेरो होय ।—रहीम (शब्द॰) ।