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संवर्ग

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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संवर्ग संज्ञा पुं॰ [सं॰] [वि॰ संवर्ग्य]

१. अपनी ओर समेटना । अपने लिये बटोरना ।

२. भक्षण । भोजन । चट कर जाना ।

३. खपत । लग जाना ।

४. एक वस्तु का दूसरी में समा जाना या लीन हो जाना । जेसे, जीव का ब्रह्म में लीन होना । यौ॰—संवर्गविद्या=विलय, तल्लीनता अथवा रूपांतर प्राप्ति का ज्ञान ।

५. गुणनफल ।

६. अग्नि का एक नाम (को॰) ।

७. बलात् ले लेना । अपहरण करना (को॰) ।