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संस्पर्ण

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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संस्पर्ण संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. अच्छी तरह छू जाने का भाव । एक के अंग का दूसरे से लगना । विशेष—धर्मशास्त्रों में कुछ लोगों का संस्पर्श होने पर द्रिजातियों के लिये प्रयश्चित्त का विधान है । यह संस्पर्शदोष शरीर के छू जाने, आलाप, निश्वन, सहभोजन तथा एक शय्या पर बैठने या सोने से कहा गया है ।

२. घनिष्ठ संबंध । गहरा लगाव ।

३. मिलाप । मेल ।

४. मिलावट । मिश्रण ।

५. इंद्रियों का विषय ग्रहण ।

६. थोड़ा सा आवि- र्भाव । कुछ प्रभाव ।