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सतराना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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सतराना क्रि॰ अ॰ [हिं॰ सतर या सं॰ संतर्जन]

१. क्रोध करना । कोप करना । उ॰—हम ही पर सतरात कन्हाई ।—सूर (शब्द॰) ।

२. कुढ़ना । चिढ़ना । बिगड़ना । उ॰—(क) जु ज्यों उझकि झाँपति बदन, झुकति बिहँसि सतराइ । तु त्यों गुलाल मुठी झुठी झझकावतु पिय जाइ ।—बिहारी (शब्द॰) । (ख) चंद दुति मंद भई, फंद में फँसी हों आय, द्वंद नंद ठानैगी रे, जोरे जुग पानि दै । सासु सतरैहै, जैठ पतिनी रिसैहै, बंक बचन सुनैहै, छाँड़ि गर की भुजानि दै ।—देव (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—जाना । उ॰—लेहु अब लेहु, तब कोऊ न सिखायो मान्यो, कोई सतराइ जाइ जाहि जाहि रोकिए ।— तुलसी (शब्द॰) ।