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सनना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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सनना क्रि॰ अ॰ [सं॰ सन्धम् (पिघल कर मिलना)]

१. जल के योग से किसी चूर्ण के कणों का एक में मिलना या लगना । गीला होकर लेई के रुप में मिलना । जैसे,—आटा सनना ।

२. गीली वस्तु के साथ मिलना । आप्लावित होना । ओतप्रोत होना । जैसे,—कपड़ा कीचड़ में सन गया ।

३. लिप्त होना । पगना । एक में मिलना । लीन होना । उ॰—बोलत बैन सनेह सने ।—सूर (शब्द॰) । संयों॰ क्रि॰—जाना ।