सन्निपात
{मुख शीर्ष}
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संज्ञा
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- अनेक चीज़ों का एकत्र होना
विलोम
[सम्पादित करें]प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]सन्निपात संज्ञा पुं॰ [सं॰]
१. एक साथ गिरना या पड़ना ।
२. जुटना । भिड़ना । टकराना ।
३. संयोग । मेल । मिश्रण ।
४. इकट्ठा होना । एक साथ जुटना ।
५. कफ, वात और पित्त तीनों का एक साथ बिगड़ना । त्रिदोष । सरसाम । विशेष—यह वास्तव में कोई अलग रोग नहीं है, बल्कि एक विशेष अवस्था है जो ज्वर या और किसी व्याधि के बिगड़ने पर होती है । यह कई प्रकार का होता है । सबसे साधारण रुप वह है जिसमें रोगी का चित भ्रांत हो जाता है, वह अंड- बंड बकने लगता है तथा उछलता कूदता है । आयुर्वेद में १३ प्रकार के सन्निपात कहे गए हैं—संधिग, अंतक, रुग्दाह, चित्त- भ्रम, शीतांग, तंद्रिक, कंठकुब्ज, कर्णक, भग्ननेत्र, रक्तष्ठीव, प्रलाप, जिह्वक, और अभिन्यास ।
६. एक साथ कई बातों का घटना या ठीक उतरना ।
७. समाहार । समूह ।
८. आना । पहुँचना (को॰) ।
९. संगीत में एक प्रकार का ताल (को॰) ।
१०. मैथुन । संभोग (को॰) ।
११. युद्ध । लड़ाई (को॰) ।
१२. ग्रहों का विशेष योग (को॰) ।