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साँकर

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शब्दसागर

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साँकर पु ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ शृङ्खल] श्रृंखला । जंजीर । सीकड़ । उ॰—(क) काड़ा आसु बूद, कसि साँकर बरुनी सजल । कीने बदन निमूद, द्दग मलिंग डारै रहत ।—बिहारी र॰, दो॰ २३० ।

साँकर ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ सङ्कीर्ण] कष्ट संकट । उ॰—(य) साँकरे की साँकरन सनमुख हो न तौरे ।—केशव (शब्द॰) । (ख) मुकती साँठि गाँठि जो करै । साँकर परे सोइ उपकरै ।—जायसी (शब्द॰) ।

साँकर ^३ वि॰

१. संकीर्ण । तंग । सँकरा ।

२. दुःखमय । कष्टमय । उ॰—सिंहल दीप जो नाहिं निबाहु । यही ठाढ़ साँकर सब काहु ।—जायसी (शब्द॰) ।