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साटक

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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साटक संज्ञा पुं॰ [?]

१. भूसी । छिलक ।

२. बिलकुल तुच्छ और निरर्थक वस्तु । निकम्मी चीज । उ॰—गज बाजि घटा, भले, भरि भटा, बनिता सुत भौंह तकै सब वै । धरनी धन धान सरीर भलो, सुर लोकहु चाहि इहै सुख ख्वै । सब फोकट साटक है तुलसी, अपनो न कछू सपनो दिन द्वै । जर जाउ सो जीवन जानकीनाथ ! जियै जग में तुम्हरो बिन ह्नै ।—तुलसी (शब्द॰) ।

३. एक प्रकार का छंद । उ॰—छंद प्रबंध कवित्त जति साटक गाह दुहत्थ ।—पृ॰ रा॰, १ ।८१ । विशेष—कुछ लोग इसे शार्दूलविक्रीडित का अपभ्रष्ट रूप मानते हैं । 'रूपदीप पिंगल' के अनुसार इसका लक्षण इस प्रकार है—कर्मे द्वादश अंक आद सज्ञा मात्रा सिवो सागरे । दुज्जी बी करिके कलाष्ट दस बी अकों विरामाधिकम् । अते गुर्व निहार धार सबके औरो कछू भेद ना । तीसो मत्त उनीस अंक चरनेसेसो भणै साटिकम् । यथा—आदीदेव प्रनम्य नम्य गुरयं बानीय बंदे पयं ।—पृ॰ रा॰ १ ।१ ।