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सिव

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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सिव बिरंचि कहँ मोहैं को है बपुरा आन ।—मानस,७ ।६२ । (ख) कहा करैं बपुरी ब्रज अबला गरब गाँठि गहि खोलै ।— घनानंद, पृ॰ ४७५ ।

सिव पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ शिव] दे॰ 'शिव' । उ॰—सिव सिवता इनही तैं लही ।—सूर॰, ३ ।१३ । यौ॰—सिवरिपु पु = शिवका शत्रु कामदेव । सिवलिंग = दे॰ 'शिवलिंग' । सिवलिंगी = एक लता । शिवलिंगी ।