सूखना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सूखना क्रि॰ अ॰ [सं॰ शुष्क, हिं॰ सूख + ना (प्रत्य॰)]

१. आर्द्रता या गीलापन न रहना । नमी या तरी का निकल जाना । रसहीन होना । जैसे,—कपड़ा सूखना, पत्ता सूखना, फूल सूखना । उ॰—बन में रूख सूख हर हर ते । मनु नृप सूख बरूथ न करते ।—गिरिधर (शब्द॰) ।

२. जल का बिलकुल न रहना या बहुत कम हो जाना । जैसे,—तालाब सूखना, नदी सूखना ।

३. उदास होना । तेज नष्ट होना । जैसे,—चेहरा सूखना ।

४. नष्ट होना । बरबाद होना । जैसे,—फसल सूखना ।

५. आर्द्रता न रहने से कड़ा होना ।

६. डरना । सन्न होना । जैसे,—जान सूखना ।

७. दुबला होना । कृश होना । जैसे,—लड़का सूख गया । मुहा॰—सूखकर काँटा होना = अत्यंत कृश होना । बहुत दुबला- पतला होना । उ॰—बदन सूख के दो ही दिन में काँटा हो गया ।—फिसाना॰, भा॰ ३, पृ॰ २३८ । सूखे खेत लहलहाना = अच्छे दिन आना । सूखे धानों पानी पड़ना = पूर्णतः निराशा की हालत में अकस्मात् इच्छा पूरी होना । ईप्सित की प्राप्ति होना । उ॰—(क) सूखत धानु परा जनु पानी ।—मानस, १ ।२६३ । (ख) बेगम समझी थीं कि सूखे धानों पानी पड़ा ।—फिसाना॰, भा॰ ३, पृ॰ २२९ । संयो॰ क्रि॰—जाना ।